दादू पंथ

 

दादू पंथ के प्रवर्तक दादू दयाल थे जिनका जन्म अहमदाबाद गुजरात में हुआ था। ये जाती से धूनिया थे। 11 वर्ष की उम्र में ब्रह्मानंद( बुड़न) जी ने इन्हे उपदेश दिया तथा इन्हीं से शिक्षा प्राप्त कर 1554 में दादू पंथ की स्थापना की। 1568 में ये गुजरात से सांभर (राजस्थान) आ गए। ये आमेर के राजा मानसिंह के समकालीन थे। 1585 में फतहपुर सीकरी की यात्रा के दौरान उन्होंने मुगल बादशाह अकबर से भेंट की तथा उन्हें अपने विचारो से प्रभावित किया। दादू जी ने अपने उपदेशों का प्रचार ढूंढाड़ी में किया। मानसिंह के समय उन्होंने कई ग्रंथो की रचना की जिनमें अहम हैं दादुजी री वाणी, दादूजी रा दूहा।

 

आगे चलकर इनके पुत्रो गरीबदास जी और मिस्किन दास जी ने इस परम पर को आगे बढ़ाया। इनके दो पुत्रियां हुई शोभा कुमारी व रूप कुमारी। दादू जी के कई शिष्य हुए जिनमें रजब जी, सुंदर दास जी,  बखाना जी व मधोदास जी विशेष स्थान रखते हैं। दादू पंथ की मुख्य शाखा नरेना/नारायणा (जयपुर) थी। इस पंथ के ज्यादातर साधु अविवाहित रहते हैं तथा किसी को गोद लेकर अपना शिष्य बनाते हैं व भगवा वस्त्र पहनते हैं। संबोधन में “सत्त राम” शब्द का प्रयोग करते हैं। ये लोग तिलक, माला व चोटी नहीं रखते हैं।

 

इनके मंदिरों को दादू द्वारा कहा जाता है जहां ये दादू वाणी रखते हैं। मृत व्यक्ति के शरीर को जंगलों में छोड़ देते हैं जिस से पशु पक्षी उन्हें खा जाए। इस पंथ के व्यक्ति ईश्वर को सर्वशक्तिमान मानते हैं। संत दादू के 152 शिष्य हुए जिनमें 100 गृहस्थ तथा 52 साधु हो गए इन्हे ही दादू के 52 स्थंभ कहा जाता है। दादू को राजस्थान का कबीर माना जाता है क्योंकि संत दादू जी ने कबीर की भांति निर्गुण भक्ति को बढ़ावा दिया है।  दादू द्वारा में होने वाले सत्संगो को “अलख दरीबा” कहा जाता है।  ये ग्यनमर्गी पद्धति में विश्वास रखते हैं।

 

संत दादूजी की मृत्यु 1603 में नारायणा में हुई, इनके पार्थिव शरीर को भैराण की पहाड़ियों में छोड़ दिया गया। इनकी मृत्यु के पश्चात दादू पंथ की छ: शाखाएं बनी। निहंग ये घुमंतू साधु हैं जो अपना जीवन भिक्षा पर ही व्यतीत करते हैं तथा दादू के उपदेशों का प्रचार करते हैं। नागा इस शाखा की स्थापना संत सुंदर दास जी ने की थी। ये अपने साथ हाथियार रखते थे तथा जयपुर राज्य में” दाखिला सैनिक” के रूप में कार्य करते थे। खालसा  ये शाखा मुख्य पीठ नारेना से संबंधित थी । इसके प्रमुख गरीबदास जी थे। विरक्त निहंग की भांति घूमंतू  साधु तथा गृहस्थियों में उपदेशों का प्रचार करते थे। खाकी  शरीर पर राख (भस्म) लगाते थे तथा खाकी वस्त्र पहनते थे। उत्तरादे/स्थान धारी वे साधु जो राजस्थान छोड़ कर उत्तर की तरफ चले गए कालांतर में स्थान विशेष पर बस गए। इस शाखा के संस्थापक बनवारी दास जी थे।इनका प्रमुख केंद्र थांभा हैं।

One Comment on “दादू पंथ”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *